
इतने सारे कवियों का क्या करें
हर शहर में सैंकड़ों मिलते हैं
शाइरों की भरमार है वे हर गली-कूचे पर पाये जाते हैं जिनसे बच निकलना तक मुश्किल है
जानता हूँ कि काल की क्रूर छलनी से जब छाना जायेगा तब इनमें से एकाध ही बचेगा लेकिन तब तक क्या करें इन मनहूस मूर्खों का
मुझे मरे हुये कवि पसन्द हैं जिन्हें छलनी से छाना जा चुका है और जिनके कंकर चुन लिये गये हैं मुझे मृत कवियों का साथ पसन्द है जीवित कवियों की बजाय
मरे हुये कवि कभी नहीं कहते आपसे कि सिगरेट पिलादो वे चाय कॉफ़ी के लिये भी नहीं कहते और उन्होंने कभी मदिरा-पान की भी इच्छा जाहिर नहीं की
जीवित कवियों के नखरे स्त्रियों से अधिक होते हैं
जबकि मृत कवि अपनी क़ब्रों में ख़ामोश सोये हुये रहते हैं केवल एक टिटहरी की आवाज़ आती रहती है रह-रह कर!
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krishnakalpit@gmail.com
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