
मैं मिट्टी का घड़ा हूँ
मगर जल से भरा हूँ
मैं पानी बाद में हूँ
मैं पहले आईना हूँ
वो कोई और होगा
मैं कोई दूसरा हूँ
अमिट है प्यास मेरी
मैं सहरा में चला हूँ
कोई तो ओट होगी
अभी तक जल रहा हूँ
मुझे रहमत में रखना
किसी का आसरा हूँ
मैं आया था कहाँ से
कहाँ को चल दिया हूँ
घड़ोंची गिर गयी है
मैं अब बिखरा पड़ा हूँ!
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krishnakalpit@gmail.com
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