
(१)
कवि हो तो मत कहो कवि हो
छिपकर रहो
किसी अपराधी की तरह
कोई धनी-स्त्री मुरीद हो तो
लंदन भाग जाओ मालिया की तरह
गूजरमल मोदी के पोते की तरह
अगर सलमान रुश्दी मेरठ में या दिल्ली में या रामपुर में बैठकर अपनी ‘शैतानी आयतें’ लिखता तो उसका क्या हश्र होता इस बात की कल्पना तक से ही रूह कांप जाती है
हनुमान अपने लांगूल पर सीतामैय्या को बिठाकर गगन-विहार कराता है जैसी मौलिक कल्पना को हमने देश-निकाला दे दिया
कहाँ गया था तुम्हारा योगिराज कृष्ण
क्यों नहीं बढ़ाया चीर
जब एक म्लेच्छ मुसव्विर देवी सरस्वती को निर्वसन कर रहा था क्या सेंचुरी कॉटन मिल बन्द हो गयी थी
या श्यामसुन्दर को योगी ने गिरफ़्तार कर लिया था
मक़बूल फ़िदा हुसेन परदेस में
देस की याद में तड़प-तड़प कर मर गया
अब इस देश में
कवि बनकर रहना मुश्किल होता जाता है !
(२)
पुरस्कृत कवि
अगली गली में रहता है
मैं कवि नहीं
मैं तो रद्दी का व्यवसाय करता हूँ !
(३)
जोगी हो जाना
कवि मत होना
प्रभुजी, एक अरज मोरी सुन लीजो
अगले जनम मोहे कवि न कीजो !
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krishnakalpit@gmail.com
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