
(१)
मैं एक अधूरे उपन्यास की पाण्डुलिपि हूँ
अठारवाँ शहर और सैंतीसवाँ घर छोड़ते हुये यह पाण्डुलिपि मुझे किताबों के बोझ से दबी फिर नज़र आई जबकि अब मुझे इससे नफ़रत-सी हो चली है जिसके पन्ने पीले पड़ गये हैं गत्ता फट गया है और जिसे मैं पिछले बत्तीस बरसों से किसी गुप्त दस्तावेज़ की तरह छिपाये हुये शहर-दर-शहर घूम रहा हूँ
यह पाण्डुलिपि फाड़ कर फेंकी भी नहीं जाती
आख़िर जितनी भी कमज़ोर है मेरी अपनी ज़िंदगी है
(२)
इस उपन्यास का प्रथम अध्याय १९९० में जयपुर के अशोक मार्ग स्थित ओ-आठ नंबर के घर के ऑउट-हॉउस में बारिश के दिनों में लिखा गया था और मुझे अच्छी तरह याद है कि जब मैं दरवाज़ा खोलकर अपनी लकड़ी की संदूकची पर काग़ज़ रखकर पूरी तल्लीनता से लिखता रहता था तो कमरे में मोर घुस आते थे
एक मोरपँख अभी भी इस पुरानी पाण्डुलिपि में फँसा हुआ है
(३)
जितने पूरे हुये
उससे अधिक अधूरे उपन्यास हैं दुनिया में
जितनीं लिखी गईं
उससे अधिक कहानियाँ बिखरी हुई हैं संसार में
(४)
बहुत अविस्मरणीय किस्से कहानियाँ आख्यान लिखे गये
लेकिन हिंदी में अभी ‘नया उपन्यास’ लिखा जाना बाक़ी है
(५)
उपन्यास फ़ुटपाथ पर पैदल चलने की कला है
(६)
सात क़दम धीरज से चलना होता है
उसके बाद
आठवाँ घर उपन्यास का है
(७)
मैं कविता के कंटकाकीर्ण पथ पर लहू-लुहान होता रहा
जबकि मुझे धँसना था गद्य-गह्वर में
जब तक जीवन है तब तक बची रहती है आस
बचा रहता है एक अधूरा उपन्यास!
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krishnakalpit@gmail.com
चित्र : सुजाता बजाज
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