
लुटियन के बुद्धिजीवियों पर नहीं
मुझे महान भारतीय जनता पर भरोसा है
जिन्हें तुम हिकारत से देखते हो
जिन्हें तुम मूर्ख समझते हो
जिन्हें तुम जात-पांत और हिन्दू-मुसलमान में बांटते हो
मुझे इन्हीं ग़रीब-ग़ुरबों पर भरोसा है
यही भारतीय जनता है जिसने कितनी सरकारों
और कितने प्रधानमंत्रियों को उखाड़ फेंका
यही भारतीय जनता है
जो सिंहासन पर आरूढ़ करती है
यही भारतीय जनता है
जो उठाकर फेंक देती है कूड़ेदान में
जो बहुत मज़बूत थी
जो बहुत चमकदार थी
जो ख़ुद को अपरिहार्य समझती थी
ऐसी कितनी ही सरकारों का तख़्ता पलट दिया
भारतीय जनता ने देखते-देखते
जो लोग मूर्ख शासकों के जुलूस पर
गुलाब की पंखड़ियाँ फेंक रहे हैं
यह भारतीय जनता नहीं भाड़े की भीड़ है
ये किराये के लोग हैं जो जयकारा लगा रहे हैं
भारतीय जनता दिखाई नहीं देती ओझल रहती है
और ख़ामोशी से खींचती रहती है
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का रथ
‘चरमर चरमर – चूँ – चरर – मरर
जा रही चली भैंसागाड़ी’
इतिहास गवाह है
महान भारतीय जनता जिस शासक को सुला देती है
उसे फिर मृत्यु ही जगाती है !
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