
रोज़-रोज़ क्या लिखना
जब तुम मुझे भूलने लग जाओगे
तब लिखूँगा नई कविता
यह याद दिलाने के लिए कि
मुझे भूलना इतना सरल नहीं है
खट्टे मीठे कड़वे और क्षार
तुम्हें मुबारक हो तुम्हारे रसागार
लेकिन वह पेय हमारे पीने के योग्य नहीं
जो गरल नहीं है
कोई सुना हुआ क़िस्सा
एक फ़ेक आइडी
एक गुमशुदा मनुष्य
एक गिरा हुआ पत्ता
टूटा हुआ कोई मधुमक्खी का छत्ता
एक अफ़वाह
एक झूठ
कोई गप्प
यह एक काल्पनिक नाम है
कृष्ण कल्पित कोई नहीं एक अफ़वाह का नाम है
सो जाऊँ
अभी से कैसे सो जाऊँ
अभी मेरी वेदना सोई नहीं है
उन आँखों का इलाज़ ज़रूरी है जो रोई नहीं है
मैली की मैली ही रही मेरी चादर
मैंने धोई नहीं है!
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krishnakalpit@gmail.com
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