
(1)
कल दोपहर जब मैं दिल्ली के बंगाली मार्किट से
रूह अफ़ज़ा शर्बत पीकर
मंडी-हॉउस मेट्रो की तरफ़ जाता था कि
त्रिवेणी-संगम-सभागार के बाहर
शमशेर सम्मान प्राप्त ख़राब कवि ने
केदार सम्मान प्राप्त ख़राब कवि की कॉलर पकड़ ली
और जब पुश्किन सम्मान प्राप्त ख़राब कवि
बीच-बचाव के लिये पहुंचा तो उसके अनियंत्रित हाथ से
नागार्जुन सम्मान प्राप्त कवि का चश्मा टूट गया
अब चारों गुत्थम-गुत्था थे
चारों में शायद यह विवाद था कि
उनमें से सर्वाधिक महत्वपूर्ण ख़राब कवि कौन है
अंदर सभागार में
रज़ा फाउंडेशन के तत्वावधान में
एक ख़राब कवयित्री (की किताब) का लोकार्पण चल रहा था
और बाहर तापमान 46* सेल्सियस था!
(2)
अच्छे कवि किसी काम के नहीं
इस दुनिया को अच्छे कवियों से अधिक
ख़राब कवियों की ज़रूरत है
ख़राब कवि अच्छे कवि का पता देते हैं
ख़राब कवि न हो तो अच्छा कवि किससे अच्छा हो
लोकार्पण संगोष्ठी विमर्श पाठ पुरस्कार समीक्षा दीक्षा विमोचन उत्सव इत्यादि के जरिये ख़राब कवि कविता का माहौल बनाये रखते हैं
ख़राब कवि न हो तो
हिंदी के कई बूढ़े आलोचकों का बुढ़ापा बिगड़ जाये
अच्छे कवि इतने कम हैं कि
उनके होने का कोई अर्थ नहीं
जबकि ख़राब कवि इस देश के
हर शहर क़स्बे में बहुतायत से पाये जाते हैं
हे ख़राब कवियो!
तुम दिल्ली इलाहाबाद लखनऊ बनारस पटना रांची रायपुर भोपाल जयपुर विदिशा बीकानेर देहरादून शिमला मुम्बई कोलकाता जहाँ कहीं भी रहते हों मैं तुम्हें दूर से प्रणाम करता हूँ एक तुम ही हो जिसने साहित्य में अच्छे बुरे का फ़र्क़ बचा रखा है
और अगर ख़राब कवयित्रियाँ नहीं होंगी तो
अच्छे कवि प्रेरणा कहाँ से पायेंगे!
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krishnakalpit@gmail.com
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