
[ नज़्र-ए-मंगलेश डबराल ]
कभी निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह जाओ तो देखियो !
एक गूंगा गायक
हारमोनियम बजाता
तन्मयता से गाता होगा
वह अपने सुर और ख़ुसरो के कलाम से भीजता रहता है
कभी उसकी आवाज़
उसकी पलकों पर छल-छला आती है
ऐसा मन्त्र-मुग्ध-मौन-मार्मिक गायन सुनकर लगता है
कि ‘आवाज़ भी एक जगह है’
और यह भी मनुष्यता का एक ठिकाना है!
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krishnakalpit@gmail.com
|| मंगलेश डबराल || तस्वीर : कृष्ण कल्पित ||
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