
‘- कथानक ख़त्म हो गए, उपन्यास अब एक समाप्त विधा है । अगर मैंने प्रकाशक से भारी-भरकम एडवांस नहीं लिया होता तो अपना अंतिम उपन्यास नहीं लिखता !’
यह कहना था सर वीडिया उर्फ़ विद्याधर सूरजप्रसाद नायपॉल का। यह बात उन्होंने अपनी मृत्य से कुछ पूर्व एक साक्षात्कार में कही थी। उनके अनुसार नॉन फिक्शन भविष्य की विधा है। यह अलग बात कि भारतीय मूल के अंग्रेज़ी लेखक विद्याधर पांडे नायपॉल को १९७१ में बुकर और २००१ में नोबेल पुरस्कार फिक्शन/कथाकृतियों पर ही मिले। फिक्शन में वे अपने भीतर के अंधेरे और नॉन फिक्शन में बाहर के अंधेरों की खोज करते रहे।
बावजूद इसके आजकल हर तरफ़ फिक्शन की बहार है। इन दिनों सारा संसार फिक्शनमय है। किस्से-कहानी, गप्प-गल्प, सच- झूठ, कल्पना-यथार्थ और अर्ध-सत्य को तत्सम और तद्भव में गूंथ दो – फिक्शन तैयार। फिक्शन में नेरेशन/वर्णन का अत्यधिक महत्व है, उसी से नया नेरेटिव/कथ्य तैयार किया जाता है जिससे जनता और पाठकों को भरमाया जाता है।
इस लिहाज़ से तो हमारे लेखकों से बड़े फिक्शननिगार हमारे राजनेता ठहरेंगे जो हर रोज़ हमारी सभ्यता- संस्कृति-धर्म के नए नैरेटिव सैट करते हैं और जिन्हें हमारे देश की भूखी प्यासी जनता दिन रात लॉलीपॉप की तरह चूसती रहती है।
१९८१ में जब सलमान रुश्दी को मिडनाइट चिल्ड्रेन के लिए बुकर मिला तब हमारे देश में फिक्शन शब्द प्रचलन में आया। रुश्दी के बाद तो भारतीय अंग्रेज़ी में लिखने वाले लेखकों की कतार लग गई। अरविंद अडिग, अमित्व घोष, रोहिंटन मिस्त्री, अरुंधती राय, अनिता देसाई इत्यादि लेखकों को तो बुकर भी प्राप्त हुए। इनमें से कई लेखक अब नोबेल के इंतिज़ार में हैं।
इसी दौर में राज नॉस्टेलजिया शब्द प्रचलन में आया। बहुत उपन्यास लिखे गए कई फ़िल्में बनी जिनमें अंग्रेज अपना औपनिवेशिक अतीत देखते हैं। हमारी गुलामी हमारा पिछड़ापन हमारी गरीबी उन्हें लुभाती है। हमारे बहुत से यशप्रार्थी लेखकों ने अपने उपन्यासों के लिए अंग्रेजी राज के कथानक चुने। जैसे हिंदी के कुलीन आलोचकों के लिए दलित आत्मकथाओं का महत्व है उसी तरह उनके लिए ये फिक्शन/उपन्यास भारतीय लेखकों की दलित आत्मकथाएं हैं।
[अपने उपन्यास रेत-समाधि के डेज़ी रॉकवेल के अंग्रेज़ी अनुवाद पर, इंटरनेशनल बुकर प्राप्त करने वाली गीतांजलि श्री यह पुरस्कार पाने वाली, विद्याधर पांडे नायपॉल के बाद उत्तरप्रदेश की दूसरी पांडे बन गई हैं। एक पांडे को बुकर दूसरी पांडे को इंटरनेशनल बुकर! पांडे , कौन ‘ सुमति ‘ तोहे लागी!]
इसके साथ महत्वपूर्ण यह तो है ही कि टैगोर की गीतांजलि के बाद यह भारतीय भाषा की दूसरी कृति है जिसे अंतरराष्ट्रीय सम्मान से नवाजा गया है। भले ही अनुवाद में । इसके साथ यह भी महत्वपूर्ण है कि इस उपन्यास में राज नॉस्टलेजिया जैसी कोई ट्रिक कोई युक्ति इस्तेमाल नहीं की गई। लिखते वक्त गीतांजलि श्री को इस बात का अंदाजा होता कि इसे बुकर मिल सकता है तो शायद इतने सरल – सहज और खिलंदड़े अंदाज़ में वे यह उपन्यास नहीं लिख सकती थीं।
जिसने शब्दों से खेलना जान लिया उसने सब कुछ जान लिया। गीतांजलि श्री उपन्यास नहीं लिखतीं, कंचे खेलती हैं। रेणु इसके सबसे बड़े खिलाड़ी थे। कथानक विहीनता को बुनना कोई आसान काम नहीं।
कविता छोड़ो। यह हर किसी के बस का नहीं। फिक्शन लिखो। हमारी कविता में उन्हें कोई दिलचस्पी नहीं। पूरब की कविता भली और पश्चिम का गद्य। उन्हें फिक्शन चाहिए।
घूम रहे डिग्गी हाउस में हर फ़न के सौदागर
जयपुर में आए हैं यारो फिक्शन के सौदागर!
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