
मेला देखने कौन जाता था, लीला
मैं तो तुम्हें देखने आता था
चकरी वाले बर्फ़ी वाले
बर्फ़ के फूल वाले
राजकचौरी वाले
बन्दूक वाले गुब्बारे वाले
जादूगर/मसख़रे
मौत का कुआँ
खेलने कौन आता था, लीला
मैं तो तुमसे खेलने आता था
तुम्हें ही खोजती रहती थीं आँखें
समूचे मेले में
तुम मिलती थी लाख की चूड़ी वाले के यहाँ
खिलखिलाती हुई
राधा, गीता, गायत्री, पुष्पादि सहेलियों के साथ
आँखे मिलते ही
चमक जाती थी आँखे
एक रौशनी-सी हो जाती थी, लीला
इशारा करती हुई तुम्हारी आँखें
पीपल के गाछ तक चली जाती थी
अब मेला उठ रहा है
मैं पीपल-गट्टे पर बैठा
तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूँ , लीला
मुझे भरोसा है अपने प्रेम पर
सहेलियों को भुलावन देकर
एक बार तुम ज़रूर आओगी
पीपल-गाछ की नीम-छाया में
मुझे अपनी बाँहों में कसने/स्पर्श करने
तुम्हारे घर जाने से पहले मुझे लगता है
बिजली ज़रूर चमकेगी
मेला उठ रहा है,
मेरी आँखें तुम्हें खोज रही हैं, लीला!
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krishnakalpit@gmail.com
चित्र : विख्यात चित्रकार Bhawanishanker Sharma .
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