
जिन जिन को था ये इश्क़ का आज़ार मर गये
अक्सर हमारे साथ के बीमार मर गये!
मीर का यह शे’र केदारजी अक्सर गुनगुनाते रहते थे। केदारजी को उर्दू शाइरी में गहरी दिलचस्पी थी। जब मैंने उन्हें अपना पसंदीदा शे’र सुनाने का आग्रह किया तो केदारजी ने जिगर मुरादाबादी का यह शे’र सुनाया:
आ कि तुझ बिन इस तरह ऐ दोस्त घबराता हूँ मैं
जैसे हर शै में किसी शै की कमी पाता हूँ मैं!
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केदारनाथ सिंह 77 के आसपास नामवरजी द्वारा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय लाये गये। 77 में ही मैं हिंदी साहित्य में एम. ए. करने राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर में आया, जबकि मेरा एडमिशन JNU में भी हो चुका था। जब मैंने केदारजी को यह बताया तो वे बोले, ‘कल्पित, अगर तू 77 में JNU आ जाता तो क्या होता?
‘मैं उदय प्रकाश बन जाता लेकिन तब कृष्ण कल्पित कौन बनता!’ मेरा उत्तर सुन कर केदारजी ने ठहाका लगाया। हम जयपुर से दिल्ली जाते हुए कार में बीयर पी रहे थे।
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‘जनसत्ता’ में मेरा नामवरजी पर एक विवादास्पद लेख छपा था – ‘आलोचना की राख ‘।
सुबह केदारजी का टेलीफ़ोन आया। पूछा – कल्पित, तुमने लिखा है कि ‘आलोचना कविता की राख है’ यह वाक्य किसने कहा है?’
‘फ़िराक़ गोरखपुरी ने।’ मैंने उत्तर दिया।
‘फ़िराक़ के अलावा यह कौन कह सकता है।’ केदारजी ने प्रत्युत्तर में कहा।
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‘अशोक वाजपेयी की कविता में आपको क्या नज़र आता है?’ एक बार एक महफ़िल ने किसी ने केदारजी को पूछा।
‘अशोक ने मुझे पहली विमान यात्रा करवाई। लेकिन अशोक के पास दो-तीन कविताएँ हैं। एक तो वह ‘मौत की ट्रेन में दिदिया’। अच्छा छोड़ो यह सब।’
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जो मूर्ख यह समझ रहे हैं कि मैं केदारनाथ सिंह का विरोधी हूँ, वे ग़लत हैं। केदारजी मेरे प्रिय कवि हैं बावज़ूद इसके कि बिंबवाद दुनिया की कविता में सौ-साल से भी पुरानी बात है। फिर भी केदारजी फ़ैज़ की तरह पुरानी चीज़ों से नया काम लेते हैं।
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मुझे लगता है मैं ग़लत समझे जाने के लिये अभिशप्त हूँ!
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krishnakalpit@gmail.com
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