
अकाल और सूखा रेगिस्तान के लिये कोई नयी बात नहीं – हर दूसरे-तीसरे बरस अकाल पड़ ही जाता था ।
अकाल के दिनों में आसमान टिड्डों से भर जाता था । वे झुण्ड के झुण्ड सिंध की तरफ़ से आते थे और बची-खुची फ़सलों को बरबाद करते आगे बढ़ते जाते थे ।
अकाल के दिनों में लोग गाँव-ढाणियों और कस्बों से शहरों की और पलायन कर जाते थे और पुराने वक़्तों में रेगिस्तान/मारवाड़ के लोग अपने ढोर-डंगरों और परिवार के साथ मालवा की ओर कूच कर जाते थे ।
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इस कहानी को विख्यात कथाकार बिज्जी ने भी ‘आशा अमरधन’ शीर्षक से लिखा है । यह उस कहानी का कृष्ण कल्पित वर्ज़न है ।
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यह छप्पनिया अकाल की बात है ।
यह इतिहास प्रसिद्ध अकाल था, जब रेगिस्तान की धरती भूख-प्यास से बेहाल हो कर मर गये पशुओं और मृत मनुष्यों की देहों से भर गई थी ।
आसमान में गिद्ध, चीलें और टिड्डे मंडराते थे और दूर-दूर तक सिर्फ़ सांय सांय सांय । रेगिस्तान की आधी से अधिक आबादी मालवा पलायन कर गयी थी ।
इसी समय रेगिस्तान के एक गाँव में एक किसान दम्पती रहता था, जिनके दो बच्चे थे । जब अनाज ख़त्म हो गया, गायों का दूध सूख गया, पेड़ों से पत्ते झर गये और खाने को कुछ नहीं रहा तो किसान दम्पति ने मालवा जाने का विचार किया ।
जाने से पहले वे अपने दोनों बच्चों को घर में बंद कर गये । किसान दम्पती ने बच्चों को फुसलाते हुये कहा – हम मालवा जा रहे हैं और थोड़े दिन बाद चूरमा-खीर लेकर वापस आयेंगे ।
चूरमा-खीर का नाम सुनकर बच्चे ख़ुश हो गये । किसान दम्पती उन बच्चों को घर में बंद करके मालवा चले गये । घर के अंदर एक बड़ा दालान था, जिसमें नीम का एक पेड़ था और किनारों पर बेरों की झाड़ियाँ लगी हुईं थी ।
बच्चे निम्बोली, बेर, कन्दमूल और खेजड़ी की छाल खाते रहे और अपने माँ पिता की प्रतीक्षा में दिन काटने लगे । रोज़ सोचते माँ बापू चूरमा-खीर लेकर आते ही होंगे ।
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कोई साल-भर बाद किसान दम्पती गाँव लौटकर आया । उन्होंने सोचा अब तक तो दोनों बच्चे भूख से मर गये होंगे । घर के पास पहुंचे तो उनको अपने घर के अंदर से बच्चों की खिलखिलाहट सुनाई दी । ताला खोलकर जब वे अंदर घुसे तो देखा – दोनों बच्चे मीठे सूखे बेर चबा रहे हैं, खेल रहे हैं और खिलखिला रहे हैं ।
माँ बाप को आया देखकर बच्चे भागकर आये और माँ बाप से चिपट गये । कहने लगे – लाओ चूरमा-खीर ।
उनकी आशा निराशा में बदल गई जब उन्हें पता चला कि माँ बाप उनके लिये चूरमा-खीर नहीं लाये हैं तो दोनों बच्चे निराश होकर वहीं लुढ़क गये और तुरन्त ही उनके प्राण पखेरू उड़ गये !
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