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एक कवि का त्यागपत्र
एक लिए बंदूक दुनालीदूजी सर पर ताज धरेइक फूलन तो डाका डालेदूजी फूलन राज करे! यह गीत तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ़ लिखा था। तब मेरी उम्र २१/२२ बरस की रही होगी। उसी के आसपास यह गीत भी लिखा जो धर्मयुग में प्रकाशित होकर बहुत लोकप्रिय हुआ: राजा रानी प्रजा मंतरी बेटा इकलौतामां…
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नमक की मंडी : हुसेन की याद
वह १९८० की एक तपती हुई दोपहर थीजब जयपुर के इंडियन कॉफी हॉउस काजालीदार दरवाज़ा खोलकरहुसेन अंदर दाख़िल हुये थेनंगे पांवकूचियों और कैमरे से लैस हुसेन जब भी जयपुर आतेयहां ज़रूर आतेकॉफ़ी हॉउस उनका पुराना अड्डा थाऔर हमारा नया आते ही हुसेन घिर गयेचित्रकारों कवियों पत्रकारों सेजैसे थम गया हो समयजैसे पूर्ण हो गया हो…
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राख उड़ने वाली दिशा में
जिधर भी जाता थाएक छाया साथ चलती थीएक गठरी लदी रहती थी पीठ परउतरता था बोझ जब रेलगाड़ी में सीट मिलती थीजनता एक्सप्रेस थी कोई मज़ाक़ नहीं किसे याद हैं वे बिस्तरबंद/होल्डालअभी कुछ समय पहले तकहम कँधे पर उठाये जाते थे रेलवे-स्टेशन तक वे लोहे की सन्दूकेंजिन पर बैठकर सिगरेट फूँकना आधी-रात चुनार के रहस्यमय…
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New India उर्फ़ नया भारत : तीन कविताएँ
(१)नया भारत बनाओगेतो पुराने को कहाँ फेंक कर आओगे तुम्हारे स्मार्ट-शहरों में कैसे रहेगामेरे जैसा पिछड़ा आदमी मेरी पुरानी साइकिल का क्या होगाजिसे मैं आज भी चलाता हूँकभी दूध कभी दवाई कभी सब्ज़ी लाता हूँ पुराने डाकघर के पास जो हमारा घर थावह किसके पास होगा भविष्य में क्या उस खण्डहर को मटियामेट कर दिया…
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साइकिल की कहानी
यह मनुष्य से भी अधिक मानवीय हैचलती हुई कोई उम्मीदठहरी हुई एक सम्भावनाउड़ती हुई पतंग की अँगुलियों की ठुमकऔर पाँवों में चपलता का अलिखित आख्यानइसे इसकी छाया से भी पहचाना जा सकता है मूषक पर गणेशबैल पर शिवजीसिंह पर दुर्गामयूर पर कार्तिकहाथी पर इन्द्रहंस पर सरस्वतीउल्लू पर लक्ष्मीभैंसे पर यमराजबीएमडब्ल्यू पर महाजनविमान पर राष्ट्राध्यक्षगधे पर…
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फ़ुटबाल के कोच
वे कोमल और कठोर एक साथ होते हैं परिपक्व और सुंदरकोई 45 का कोई 55 का कोई 67 का तो कोई 72 का धीरज और बेचैनीयुद्ध और शांतिकरुणा और क्रोधप्रेम और घृणा एक साथ झलकती है उनके चेहरों से वे टहलते रहते हैं मैदान के बाहर बेचैनी सेकभी बैठ जाते हैं कुर्सी पर धम्म सेकरते…
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फेरारी में फ़रार : एक संस्मरण
फ़ेरारी में बैठकर हम फ़रार हुए ! जब पुलिस हमारी खोज में झुंझुनू स्थित राणी सती मंदिर परिसर पहुँची तब हम बीरबल चायवाले की दुकान के पीछे एक माचे पर बैठकर गाँजे की चिलम पी रहे थे । मैं गीली-साफ़ी में चिलम को अच्छे से लपेटकर स्हार ही रहा था कि बीरबल चायवाला साइकिल से…
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दिल्ली के कवि : सात कविताएं
||1|| कोई शोक का कवि थाकोई लोक का कवि थाकोई सभागार में चहकता थाकोई चौक का कवि थाकोई ख़ुदरा व्यवसाई थाकोई थोक का कवि थाकोई बांदा से आया थाकोई टोंक का कवि था इस असार संसार में एक से एक कवि थे! ||2|| रेगिस्तान से जो कवि १९८७ में दिल्ली आया थावह १९९० में जमुना…
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कवि, कबाड़ी और सुनो सम्राट : तीन कविताएं
|| कवि || उसे लगता था कि वह अमर हो चुका हैया किसी भी दिन हो जाएगा इसी उधेड़बुन में एक दिन वह मर गया! || कबाड़ी || मनुष्यता के कम काम आती हैं अधिकतर महानताएँकबाड़ी ढोता है! || सुनो सम्राट || सभी कवियों को पुरस्कृत कर दिया गया एक छिपा रह गयावही तुम्हारा काल…
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फ़िक्शन के सौदागर
‘- कथानक ख़त्म हो गए, उपन्यास अब एक समाप्त विधा है । अगर मैंने प्रकाशक से भारी-भरकम एडवांस नहीं लिया होता तो अपना अंतिम उपन्यास नहीं लिखता !’ यह कहना था सर वीडिया उर्फ़ विद्याधर सूरजप्रसाद नायपॉल का। यह बात उन्होंने अपनी मृत्य से कुछ पूर्व एक साक्षात्कार में कही थी। उनके अनुसार नॉन फिक्शन…